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मैं लेखक इसलिए नहीं बना कि मुझे लिखना आता है बल्कि मैं लेखक इसलिए बना क्योंकि मेरे पास कहने को बहुत कुछ था और सुनने वाला कोई नहीं |
मेरी ज़िंदगी में भी एक कहानी थी - अधूरी,उलझी हुई और जरूरत से ज्यादा सच्ची | मैंने बहुत कोशिश की कि उसे भूल जाऊँ , लेकिन कुछ यादें भुलने के लिए नहीं होती, वो लिखने के लिए होती है |
जब लोग सो जाते है, मैं जागता हूँ क्योंकि रातें मेरे सवालों से नहीं डरती | मैं अक्सर प्रेम के बारे में लिखता हूँ क्योंकि मैंने उसे खोया है, मैं दर्द के बारे में लिखता हूँ क्योंकि मैंने उसे जिया है |
ये किताब किसी हीरो की नहीं है | ये उस इंसान की है जो टूटकर भी खामोश नहीं रहा | वो जगह जिसका कोई नाम नहीं है | लोग वहा बस इसलिए रुकते हैं क्योंकि कहीं और रुकने की वजह नहीं होती |
एक पुरानी सी बेंच थी वहाँ जिसका एक पाया हमेशा हिलता रहता है | शाम होते ही धूल और यादें एक साथ जमने लगती हैं |
लोग आते हैं, बैठते हैं और चले जाते हैं | पर कुछ लोग वहीं रह जाते हैं | मैं भी उन्ही में से एक हूँ | मैं रोज उसी समय वहाँ आता हूँ जब दिन और रात आपस में झगड़ रहे होते हैं, जब भीड़ कम होती है और खुद से बात करना आसान |
उस जगह ने मुझसे कुछ नहीं मांगा - न नाम, न पता, न मेरी कहानी | बस मुझे चुपचाप मुझे बैठने दिया | कभी - कभी लगता है कि इस जगह को मुझसे ज्यादा पता है कि मैंने क्या खोया है |
और शायद मैंने लिखना भी इसिलिए शुरू किया क्योंकि इसने मुझे पहली बार सुन था |
मुझे ठीक से याद नहीं कि मैं पहली बार यहाँ क्यूँ आया था | बस इतना याद है की उस दिन मेरा मन बहुत भारी था |
शाम ढल रही थी, आसमान वैसा ही था जैसा तब होता है | जब कुछ कहने को होता है लेकिन शब्द नहीं मिलते |
मैं बेंच के उस सिरे पे बैठ था जो हमेशा हिलता रहता है | अजीब बात है - वही सिर मुझे पसंद था | शायद इसलिए क्योंकि मैं भी अंदर
Ahoj! Jsem Libroamiko, tvůj knižní rádce.
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