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पुस्तक पूर्ण करने के लिये मैं बनारस की गलियों में सब कुछ देखते, समझते हुए हर गली में घूमी, हर गली के ईंट, दरवाजे, घर, कुएँ, मन्दिर सबको देखकर ऐसा लगा कि ये सब अपने हैं। बैठे रहो यहीं पर शायद कई जन्म गुजर जाएँगे। यहाँ के चबूतरे, कुएँ, दरवाजे, मन्दिर के हिस्से को देखकर लगता है कि जीवन यही है। इन गलियों को चाहते हुए भी छोड़ पाना बहुत कठिन है। इन गलियों की जीवंतता और अल्हड़पन में भी एक सन्देश है।
प्रस्तुत पुस्तक को लिखने के लिये मैं मन्दिर के पुजारियों, नाविकों, दुकानदारों, पंडों, घाटियों, पंडितों, लोगों को टीका लगाने वालों, गवनिहारिनों, दूध, दही बेचने वालों, नाऊ यात्रियों आदि बहुत से लोगों से मिली, जिन्होंने पुस्तक को सार्थक बनाने के महत्वपूर्ण सुझाव दिये।
प्रस्तुत पुस्तक उन सभी पाठकों के लिये उपयोगी है जो बनारस की गलियों और बदलते हुए बनारस के बारे में जानना चाहते हैं।
Ahoj! Jsem Libroamiko, tvůj knižní rádce.
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