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दाग़ देहलवी उर्दू शायरी के एक लोकप्रिय और रूमानी शायर थे। उनका असली नाम नवाब मिर्ज़ा ख़ान था, और उनका जन्म 1831 में दिल्ली में हुआ था। दाग़ की शायरी में मोहब्बत, नाज़ुक एहसास, और ज़िंदगी के हसीन रंग बड़ी खूबसूरती से उभरते हैं। वे सरल, मधुर और आमफ़हम भाषा में ग़ज़लें कहते थे, जिससे आम जनता से गहरा जुड़ाव बनता था।
उनकी शायरी में लखनवी नज़ाकत और दिल्ली की सादगी का सुंदर संगम देखने को मिलता है। उन्होंने अपने कलाम में इश्क़ के विभिन्न रंगों को बख़ूबी पेश किया। दाग़ के शागिर्दों में जिगर मुरादाबादी, हसरत मोहानी और अल्लामा इक़बाल जैसे नाम भी शामिल हैं।
दाग़ देहलवी हैदराबाद के निज़ाम के दरबार में भी मुख्य शायर रहे। उनका निधन 1905 में हुआ, लेकिन उनकी शायरी आज भी महफ़िलों की जान बनी हुई है।
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